अस्पताल में अक्सर सुनने को मिलता है कि किसी मरीज को ऑक्सीजन सपोर्ट दिया जा रहा है, जबकि किसी मरीज को वेंटिलेटर पर रखा गया है। बहुत से लोग इन दोनों को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन वास्तव में इनके काम में बड़ा अंतर होता है।
सरल भाषा में समझें
ऑक्सीजन सपोर्ट क्या होता है?
सामान्य हवा में लगभग 21 प्रतिशत ऑक्सीजन होती है। जब किसी बीमारी के कारण फेफड़े शरीर तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुँचा पाते, तब मरीज को अतिरिक्त ऑक्सीजन दी जाती है।
ऑक्सीजन निम्न तरीकों से दी जा सकती है:
इस दौरान मरीज सामान्यतः अपने फेफड़ों और साँस की मांसपेशियों से खुद साँस लेता है। मशीन या सिलेंडर केवल उसकी साँस में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाता है। ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत निमोनिया, फेफड़ों के संक्रमण, अस्थमा, COPD, हृदय रोग या रक्त में ऑक्सीजन की कमी जैसी स्थितियों में पड़ सकती है।
वेंटिलेटर क्या होता है?
वेंटिलेटर एक विशेष मशीन है, जो निश्चित दबाव के साथ हवा और जरूरत के अनुसार ऑक्सीजन को फेफड़ों के अंदर पहुँचाती है।
यह मशीन:
गंभीर स्थिति में वेंटिलेटर मरीज के लिए साँस लेने का अधिकांश काम कर सकता है।
क्या वेंटिलेटर केवल ऑक्सीजन देने वाली मशीन है?
नहीं। ऑक्सीजन सपोर्ट का मुख्य काम साँस में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाना होता है। वहीं वेंटिलेटर ऑक्सीजन देने के साथ-साथ हवा को दबाव से फेफड़ों में पहुँचाता है और साँस लेने की पूरी प्रक्रिया में मदद करता है। इसलिए हर वेंटिलेटर वाले मरीज को आवश्यकता के अनुसार ऑक्सीजन भी दी जा सकती है, लेकिन हर ऑक्सीजन लेने वाला मरीज वेंटिलेटर पर नहीं होता।
वेंटिलेटर कितने प्रकार से लगाया जाता है?
1. नॉन-इनवेसिव वेंटिलेशन
इसमें मरीज के चेहरे पर कसकर फिट होने वाला मास्क लगाया जाता है। मशीन मास्क के माध्यम से दबाव के साथ हवा देती है। CPAP और BiPAP इसके उदाहरण हैं। इसमें गले के अंदर नली डालने की आवश्यकता नहीं होती और मरीज कुछ हद तक खुद भी साँस लेता रहता है।
2. इनवेसिव वेंटिलेशन
जब मरीज की हालत बहुत गंभीर होती है, तब मुँह के रास्ते एक साँस की नली श्वासनली तक डाली जाती है। इस प्रक्रिया को इंट्यूबेशन कहा जाता है। फिर इस नली को वेंटिलेटर मशीन से जोड़ दिया जाता है। लंबे समय तक वेंटिलेटर की जरूरत होने पर गर्दन में छोटा छेद करके ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब भी लगाई जा सकती है।
वेंटिलेटर कब लगाया जाता है?
वेंटिलेटर की आवश्यकता तब पड़ सकती है जब:
दोनों के बीच मुख्य अंतर
ऑक्सीजन सपोर्ट:
वेंटिलेटर:
क्या ऑक्सीजन कम होते ही वेंटिलेटर लगा दिया जाता है?
नहीं। डॉक्टर केवल ऑक्सीमीटर की एक रीडिंग देखकर वेंटिलेटर लगाने का निर्णय नहीं लेते। इसके लिए मरीज की पूरी स्थिति देखी जाती है, जैसे ऑक्सीजन सैचुरेशन, साँस लेने की गति, मरीज को साँस लेने में कितनी मेहनत करनी पड़ रही है, मरीज होश में है या नहीं, रक्त में ऑक्सीजन व कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा, और ऑक्सीजन देने के बाद सुधार हो रहा है या नहीं। जरूरत के अनुसार पहले ऑक्सीजन, फिर हाई-फ्लो ऑक्सीजन, BiPAP या CPAP और गंभीर स्थिति में वेंटिलेटर का उपयोग किया जा सकता है।
क्या वेंटिलेटर लगने का मतलब उम्मीद खत्म होना है?
बिल्कुल नहीं। वेंटिलेटर बीमारी का सीधा इलाज नहीं करता, बल्कि मरीज को साँस देकर शरीर को ठीक होने का समय देता है। मरीज के ठीक होने पर वेंटिलेटर की सहायता धीरे-धीरे कम की जाती है। इस प्रक्रिया को वीनिंग कहा जाता है।
क्या वेंटिलेटर के खतरे भी हो सकते हैं?
वेंटिलेटर जीवन बचाने वाली मशीन है, लेकिन लंबे समय तक इसके उपयोग से कुछ जोखिम हो सकते हैं, जैसे फेफड़ों में संक्रमण, गले या श्वासनली में चोट, अधिक दबाव से फेफड़ों को नुकसान, शरीर की मांसपेशियों में कमजोरी, या दवाओं के दुष्प्रभाव। इसीलिए वेंटिलेटर पर रखे गए मरीज की लगातार निगरानी की जाती है।
जरूरी बात
ऑक्सीजन भी एक प्रकार की दवा है। इसे बिना डॉक्टर की सलाह के मनमाने प्रवाह पर नहीं लेना चाहिए। कुछ मरीजों में जरूरत से अधिक ऑक्सीजन भी नुकसान पहुँचा सकती है। साँस लेने में अचानक कठिनाई, होंठ नीले पड़ना, अत्यधिक सुस्ती, भ्रम होना या ऑक्सीजन स्तर लगातार कम रहना आपातकालीन स्थिति हो सकती है। ऐसे में तुरंत अस्पताल जाएँ।
निष्कर्ष
ऑक्सीजन सपोर्ट में मरीज खुद साँस लेता है और उसे अतिरिक्त ऑक्सीजन मिलती है। वेंटिलेटर मरीज की साँसों को सहारा देता है और गंभीर स्थिति में उसके लिए साँस लेने का काम भी करता है। इसलिए ऑक्सीजन और वेंटिलेटर एक ही चीज नहीं हैं। मरीज को किस प्रकार की सहायता की जरूरत है, इसका निर्णय उसकी बीमारी और स्थिति देखकर डॉक्टर करते हैं।